खुद से बिछड़ के

— जब टूटना ही राह बन गई

हर एक उसूल को मैंने मिट्टी में मिला दिया,

तेरे खातिर जमीर का हर पन्ना जला दिया।

अपनों के ही हाथ छोड़, सारे नाते तोड़ लिए,

तेरे कदमों में मैंने अपने सारे सपने जोड़ लिए।

तेरे आगे झुक कर मैं अपनी हस्ती भूल गया,

मैं कौन था, ये जानने की हर दुआ भूल गया।

गिड़गिड़ा कर मांगी थी मैंने थोड़ी सी वफ़ाई,

तेरी खामोशी ने दी मुझे फ़क़त तन्हाई।

बदले में क्या मिला, बस यही एक सवाल है,

जो बचा है अंदर, वो बिखरा हुआ हाल है।

पैरों से बंधे पत्थर अब मैं हटा रहा हूँ,

गिर कर उठा हूँ, अब खुद को बना रहा हूँ।

न तुझसे कोई शिकायत, न कोई अब गिला है,

इस टूटने में ही मुझको, असल में मैं मिला है।

लौट आया हूँ मैं अब, छोड़ के वो भीड़-भार,

जिंदा हूँ, मज़बूत हूँ, अब जीने का है नया एतबार।

— P.K.
Wapas Blog par